मस्ते दोस्तों! आजकल के इस भागदौड़ भरे जीवन में जहां हर नुक्कड़ पर बड़े बड़े कांच वाले एसी सैलून और ब्यूटी पार्लर खुल गए हैं वहां हमारी एक बहुत ही प्यारी और पुरानी याद कहीं पीछे छूटती जा रही है और वह याद है हमारे मोहल्ले की पुरानी नाई की दुकान।

वह छोटी सी दुकान जो गली के किसी कोने पर या पेड़ की घनी छांव के नीचे हुआ करती थी। यह दुकान सिर्फ बाल काटने या दाढ़ी बनाने की जगह बिल्कुल नहीं थी बल्कि यह तो मोहल्ले भर की दोस्ती गपशप राजनीति क्रिकेट और जीवन के अनगिनत किस्सों का सबसे बड़ा और पक्का ठिकाना हुआ करती थी।

आपको याद ही होगा जब हम उस दुकान के करीब पहुंचते थे तो अंदर से उड़ती हुई टेलकम पाउडर और फिटकरी की वह जानी पहचानी महक सीधे हमारे बचपन की यादों को ताजा कर देती थी। अंदर घुसते ही एक कोने में रखे पुराने रेडियो पर बजता हुआ किशोर कुमार या मोहम्मद रफी का कोई पुराना और मीठा सा गाना कानों में पड़ता था।

दुकान की दीवारों पर पुरानी फिल्मों के हीरो जैसे राज कपूर अमिताभ बच्चन से लेकर सलमान खान तक के रंग बिरंगे पोस्टर चिपके होते थे जिन्हें देखकर हम सोचते थे कि आज हम भी बिल्कुल ऐसे ही बाल कटवाएंगे। बीच में रखी वह भारी भरकम लोहे और गद्दे वाली कुर्सी जिस पर एक लाल या काले रंग का कपड़ा पड़ा होता था और नाई काका का वह पुराना लकड़ी का कंघा कैंची और उस्तरा जो जाने कितने सालों से वहां अपनी सेवा दे रहा था।

नाई काका जैसे ही कैंची उठा कर पूछना शुरू करते थे कि बताओ भाई आज कैसा कटवाना है फौजी कट या बिल्कुल छोटे वाले और बस उसी सवाल के साथ शुरू हो जाती थी मोहल्ले की सबसे लंबी बातचीत। दुकान के एक तरफ बैठा कोई आदमी अपनी शादी के किस्से सुना रहा होता था तो दूसरी तरफ कोई देश की राजनीति पर गर्मागरम बहस छेड़ देता था।

मोहल्ले में किसके घर क्या चल रहा है और क्रिकेट मैच में कल किसने कितने छक्के मारे यह सारी खबरें आपको टीवी से पहले इसी नाई की दुकान पर मिल जाया करती थीं। नाई काका भी बाल काटते काटते हर बात में अपनी पूरी राय देते थे और उनका उस्तरा और जबान दोनों एक ही रफ्तार से चलते थे।

मुझे आज भी अपने बचपन के वो दिन बहुत अच्छी तरह से याद हैं जब पिताजी हर महीने उंगली पकड़कर मुझे बाल कटवाने ले जाया करते थे। दुकान में घुसते ही एक अजीब सा डर लगता था कि कहीं गलती से कान ना कट जाए। क्योंकि हम उस बड़ी कुर्सी पर बैठने के लिए बहुत छोटे होते थे इसलिए नाई काका कुर्सी के दोनों हाथों पर एक लकड़ी का पट्टा रख देते थे और हमें उस पर बिठा दिया जाता था।

उनका वह प्यार से कहना कि बेटा डर मत बस आंख बंद कर ले और गर्दन सीधी रख आज भी कानों में गूंजता है। बाल कटने के बाद जब वह ठंडे पानी का फव्वारा मारते थे और सिर की हल्की सी मालिश कर देते थे तो मानो सारी नींद उड़ जाती थी। वहां बैठे बैठे बड़ों को दाढ़ी बनवाते हुए देखना भी किसी जादू से कम नहीं लगता था जब नाई काका सफेद झाग बनाकर चेहरे पर लगाते थे।

रविवार की सुबह तो नाई की दुकान का नजारा किसी छोटे मेले जैसा होता था। लोगों की लंबी लाइन लगी होती थी और हर कोई अपनी बारी का इंतजार करते हुए अखबार के पन्ने पलटता रहता था। गांवों में तो यह दुकान और भी ज्यादा खास हुआ करती थी।

वहां के नाई जी सिर्फ बाल ही नहीं काटते थे बल्कि गांव की शादियों में दूल्हे और बारातियों को सजाने संवारने की पूरी जिम्मेदारी भी उन्हीं की होती थी। कभी कभी थकान मिटाने के लिए वह सरसों या नवरत्न तेल से सिर की ऐसी चंपी करते थे कि दिमाग की सारी नसें खुल जाती थीं और उसका मजा ही कुछ और होता था।

आज समय बहुत बदल गया है। शहरों में कई पुरानी नाई की दुकानें अब आधुनिक सैलून में बदल चुकी हैं। वहां अब बड़े बड़े शीशे एसी ब्रांडेड क्रीम और तरह तरह के फेस वॉश आ गए हैं। आजकल के युवा भी फेड हेयरकट अंडरकट और बालों में तरह तरह के रंग करवाने लगे हैं।

लेकिन इतनी चकाचौंध के बाद भी उस पुरानी दुकान जैसी गर्माहट और अपनेपन का अहसास वहां कहीं नहीं मिलता। आज भी कई लोग ऐसे हैं जो महंगे सैलून जाने के बजाय अपने उन्हीं पुराने नाई काका के पास जाना पसंद करते हैं। उनका कहना होता है कि यह आदमी पिछले बीस सालों से मेरे बाल काट रहा है और मेरे बालों के हर कोने को अच्छी तरह समझता है। यह जो विश्वास का रिश्ता है वह किसी भी ब्रांडेड सैलून में नहीं खरीदा जा सकता।

सच कहा जाए तो नाई की दुकान सिर्फ एक व्यापार की जगह नहीं बल्कि हमारे समाज का एक बहुत खूबसूरत आईना है। यहां आकर अमीर और गरीब बड़ा और छोटा सब एक बराबर हो जाते हैं। यहां किसी की हैसियत नहीं पूछी जाती बस आराम से बैठिए बाल कटवाइए और मोहल्ले की खबरों का आनंद लीजिए।

कोरोना की बीमारी के समय जब सारे सैलून बंद थे तब जाकर हमें अपनी उसी पुरानी नाई की दुकान की सबसे ज्यादा कमी महसूस हुई थी। जब लोगों ने घर पर ही अपने और बच्चों के बाल काटने की कोशिश की थी तो जाने कितने ही मजेदार किस्से बने थे।

तो मेरे प्यारे दोस्तों अगर आप काफी लंबे समय से बाल कटवाने किसी पुरानी दुकान पर नहीं गए हैं तो आज ही अपने मोहल्ले की किसी पुरानी नाई की दुकान पर जरूर जाइएगा। यकीन मानिए वहां आपको सिर्फ एक अच्छा हेयरकट ही नहीं मिलेगा बल्कि आपके बचपन की बहुत सी पुरानी और मीठी यादें भी पूरी तरह से ताजा हो जाएंगी।

अगर आपके पास भी नाई की दुकान से जुड़ा हुआ कोई मजेदार किस्सा या बचपन की कोई खास याद है तो उसे अपने दोस्तों को जरूर बताइएगा। नाई की दुकान वह जगह है जहां सिर्फ बाल ही नहीं कटते बल्कि दिलों की दूरियां भी कटती हैं और अच्छी दोस्ती बढ़ती है।

यह लेख आपको पसंद आए तो इसे अपनों के साथ साझा जरूर करें। अगली बार मिलेंगे किसी और खूबसूरत पुरानी याद के साथ। ऐसी खबरों के लिए देखते रहिए nikee.in

धन्यवाद
जय हिंद
आपका अपना लेखक
मनोज बाबू

Leave a Reply

Discover more from nikee.in

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading