लेखक: मनोज बाबू लौकी की खेती भारत में गर्मियों और बरसात की मौसम में बहुत लोकप्रिय है। यह कम समय में तैयार होने वाली, कम लागत वाली और अच्छी आमदनी देने वाली सब्जी फसल है। लौकी को घीया या दूधी भी कहते हैं। यह कुकुरबिट परिवार की बेल वाली फसल है जो गर्मी में ठंडक देने वाली सब्जी के रूप में घरों की थाली में जगह बनाती है। भारत में इसकी खेती प्राचीन काल से होती आ रही है और आज यह किसानों के लिए अच्छा विकल्प बन चुकी है। आइए इसकी पूरी जानकारी सही और विस्तार से समझते हैं।लौकी की उत्पत्ति और भारत में इतिहासलौकी की जड़ें अफ्रीका में मानी जाती हैं जहां इसका domestication लगभग 12000 साल पहले हुआ। लेकिन भारत में इसे 2000 ईसा पूर्व से उगाया जा रहा है। पुरातात्विक प्रमाण और प्राचीन ग्रंथों में इसका जिक्र मिलता है। यहां की गर्म जलवायु और विविध मिट्टी इसे बहुत अनुकूल बनाती है। भारत में यह सदियों से सब्जी, औषधि और यहां तक कि सूखे फल से बर्तन बनाने के काम आती रही है। आज भारत दुनिया के प्रमुख लौकी उत्पादकों में शामिल है।भारत में लौकी की खेती कब की जाती हैलौकी गर्म मौसम की फसल है लेकिन तीन मौसमों में उगाई जा सकती है:जायद या ग्रीष्मकालीन फसल: जनवरी के अंत से मार्च तक बुवाई। फरवरी-मार्च सबसे अच्छा समय माना जाता है। फसल अप्रैल-जून में तैयार होती है।खरीफ या वर्षा ऋतु फसल: जून-जुलाई में बुवाई। यह सितंबर-अक्टूबर तक तैयार हो जाती है।रबी या सर्दियों की फसल: अक्टूबर-नवंबर में कुछ इलाकों में, लेकिन ठंड ज्यादा होने पर पाला लगने का खतरा रहता है। पॉलीहाउस में साल भर उगा सकते हैं।आदर्श तापमान 25-35 डिग्री सेल्सियस है। बीज अंकुरण के लिए 18-30 डिग्री उपयुक्त रहता है। ठंड में विकास धीमा हो जाता है और पाला पड़ने से पौधे नष्ट हो सकते हैं।खेती की पूरी तकनीकलौकी की खेती आसान है लेकिन अच्छी पैदावार के लिए सही तरीका अपनाना जरूरी है। मचान या बावर विधि से उत्पादन कई गुना बढ़ जाता है।मिट्टी की तैयारी: अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट या दोमट मिट्टी सबसे बेहतर है। मिट्टी का पीएच 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए। खेत की 4-5 बार जुताई करें। आखिरी जुताई में 15-25 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी गोबर की खाद या कंपोस्ट मिलाएं। ऊंची क्यारियां या बैड बनाएं – बैड 2-2.5 मीटर चौड़े और 1.5-2 मीटर दूरी पर। बरसात में जल निकासी का विशेष ध्यान रखें।बीज की मात्रा और बुवाई: प्रति हेक्टेयर 2.5-4 किलो बीज या प्रति एकड़ 400-600 ग्राम हाइब्रिड बीज काफी है। बीज को बोने से पहले 2-3 घंटे पानी में भिगोएं या ट्राइकोडर्मा, कार्बेंडाजिम या ब्लू कॉपर से उपचारित करें। पंक्ति से पंक्ति 2-2.5 मीटर और पौधे से पौधे 45-90 सेंटीमीटर दूरी रखें। गड्ढे या थाले में 2-3 बीज 2-3 सेंटीमीटर गहराई पर बोएं। अंकुरण के 10-15 दिन बाद स्वस्थ पौधा रखें। मचान विधि में बांस या तार का सहारा दें ताकि बेलें फैल सकें और फल साफ रहें।सिंचाई: लौकी में पानी की जरूरत ज्यादा होती है। बुवाई से पहले खेत भिगोएं। गर्मी में 4-6 दिन के अंतर पर हल्की सिंचाई करें। कुल 8-12 सिंचाइयां। ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग से पानी बचता है और जड़ सड़न कम होती है। बरसात में अतिरिक्त पानी से बचें।खाद और उर्वरक: आधार में 20-25 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर। रासायनिक उर्वरक में 80-120 किलो नाइट्रोजन, 50-60 किलो फास्फोरस और 50-60 किलो पोटाश। आधा नाइट्रोजन बुवाई के समय और बाकी फल लगने पर दें। जैविक खाद जैसे वर्मीकंपोस्ट या नीम खली का इस्तेमाल फसल को स्वस्थ रखता है।कीट और रोग नियंत्रण: आम समस्याएं हैं फल मक्खी, लाल कद्दू भृंग, एफिड्स, पाउडरी मिल्ड्यू और डाउनी मिल्ड्यू। नीम तेल, नीम आधारित दवाएं या फेरोमोन ट्रैप इस्तेमाल करें। खेत साफ रखें, हवा का आवागमन अच्छा रखें और फसल चक्र अपनाएं। जरूरत पड़ने पर अनुशंसित कीटनाशक या फफूंदनाशक का इस्तेमाल करें।कटाई: बुवाई के 50-70 दिन बाद पहली तुड़ाई शुरू होती है। फल हरे, कुरकुरे और मध्यम आकार (नरम) के होने पर तोड़ें। ज्यादा बड़े होने पर स्वाद कड़वा हो जाता है और बीज बनने लगते हैं। नियमित तुड़ाई से नई फल लगते रहते हैं। फसल 90-120 दिनों में पूरी हो जाती है।प्रमुख किस्में: पूसा नवीन, पूसा संदेश, पूसा संतुष्टि, पूसा हाइब्रिड-3, अर्का बहार, काशी बहार, काशी कुंडल, काशी गौरव, पंजाब लॉन्ग, नरेंद्र रश्मि, माधुरी आदि। हाइब्रिड किस्में जल्दी तैयार होती हैं और ज्यादा पैदावार देती हैं।पैदावार: साधारण तरीके से 200-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर। अच्छी तकनीक और हाइब्रिड किस्म से 300-400 क्विंटल या प्रति एकड़ 80-150 क्विंटल तक हो सकती है।भारत में लौकी की खेती कहां ज्यादा होती हैभारत में लौकी लगभग हर राज्य में उगाई जाती है लेकिन प्रमुख उत्पादक राज्य हैं बिहार (सबसे ज्यादा, करीब 20 प्रतिशत हिस्सा), उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश। बिहार की उपजाऊ मिट्टी और अनुकूल मौसम इसे सबसे आगे रखता है। उत्तर भारत में ग्रीष्मकालीन और मध्य भारत में व्यावसायिक खेती ज्यादा देखने को मिलती है।लौकी खाने से क्या फायदे हैंलौकी लगभग 92-95 प्रतिशत पानी से बनी होती है। इसमें कैलोरी बहुत कम होती है लेकिन विटामिन सी, विटामिन के, कैल्शियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स अच्छी मात्रा में मिलते हैं।वजन घटाने में मदद: कम कैलोरी और ज्यादा फाइबर से पेट भरा रहता है, मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है।पाचन सुधार: फाइबर कब्ज, गैस और अपच दूर करता है, आंतों को साफ रखता है।ब्लड शुगर नियंत्रण: डायबिटीज वाले लोगों के लिए अच्छा, इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ाता है।दिल और रक्तचाप: पोटैशियम ब्लड प्रेशर कंट्रोल करता है और कोलेस्ट्रॉल कम करता है।हड्डियां मजबूत: कैल्शियम, मैग्नीशियम और विटामिन के हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाते हैं।ठंडक और हाइड्रेशन: गर्मी में शरीर को ठंडक देता है और डिहाइड्रेशन से बचाता है।त्वचा और बाल: पानी और एंटीऑक्सीडेंट्स से चमक बढ़ती है।अन्य: नींद बेहतर करता है, यूरिनरी इंफेक्शन में राहत, डिटॉक्स प्रभाव।लौकी का जूस सुबह खाली पेट पीना या सब्जी, रायता, हलवा बनाकर खाना फायदेमंद है। कुछ लोगों को ज्यादा मात्रा में पेट फूलने की शिकायत हो सकती है इसलिए संतुलित मात्रा में लें।लौकी की खेती कम खर्च में शुरू हो जाती है और सही बाजार मिलने पर अच्छा मुनाफा देती है। मचान विधि, ड्रिप सिंचाई और हाइब्रिड बीज अपनाकर उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। अगर आप खेती करना चाहते हैं तो स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें। यह फसल न सिर्फ किसानों की आय बढ़ाती है बल्कि गर्मियों में लोगों को स्वास्थ्य और ठंडक भी देती है। सही समय पर बुवाई, नियमित देखभाल और थोड़ी मेहनत से लौकी की खेती आपको अच्छा रिटर्न दे सकती है।अधिक जानकारी के लिए nikee.in पर जाएं Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Like this:Like Loading...Relatedपोस्ट नेविगेशनभिंडी की खेती: पंजाब और उत्तर भारत के किसानों के लिए आसान और लाभदायक तरीका खीरा की खेती: पूरी जानकारी, 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